किसी देवता के नाम केवल पुकारने के शब्द नहीं होते — वे उसके स्वरूप के द्वार होते हैं। हर नाम के पीछे एक कथा है, एक गुण है, एक क्षण है जब भक्त ने बाबा को उस रूप में अनुभव किया और वही नाम सदा के लिए जुड़ गया।
खाटू श्याम के चौरासी नामों का सम्पूर्ण संग्रह तो अपने स्थान पर है ही, पर कुछ नाम ऐसे हैं जो भक्तों की ज़बान पर सबसे अधिक चढ़े हैं। इन्हीं प्रसिद्ध नामों के पीछे की कथा यहाँ देखें।
शीश के दानी
सबसे पहला और सबसे गहरा नाम — “शीश के दानी”। बर्बरीक की कथा में जब श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश में उनसे दान माँगा, तो उन्होंने अपना मस्तक तक दे दिया — बिना किसी प्रश्न, बिना किसी शर्त के।
दान की अनेक परम्पराएँ हैं — कोई धन देता है, कोई समय, कोई सेवा। पर अपना ही शीश दे देना — अपना अस्तित्व अर्पित कर देना — यह दान की पराकाष्ठा है। इसी एक क्षण ने बर्बरीक को कलियुग का आराध्य बना दिया। “शीश के दानी” नाम हमें याद दिलाता है कि भक्ति की असली कसौटी समर्पण है, माँग नहीं।
लखदातार
“लखदातार” अर्थात लाखों को देने वाला। यह नाम बाबा के उस स्वभाव की ओर संकेत करता है जिसमें वे भक्त की झोली कभी खाली नहीं जाने देते।
पर इस नाम का भाव केवल भौतिक देन तक सीमित नहीं। लखदातार वह है जो लाखों को आशा देता है, लाखों के टूटे मन को सहारा देता है, और फाल्गुन मेले में आने वाले लाखों भक्तों में से किसी को निराश नहीं लौटाता। देना उनका स्वभाव है — और जो स्वयं अपना शीश दे चुका हो, उसके लिए देने में कोई संकोच कैसा।
मोरछड़ी धारी और मोरवीनंदन
बाबा के दरबार और उनके मुकुट को सजाने वाले मोरपंख इतने प्रिय हैं कि उन्हें “मोरछड़ी धारी” कहा जाता है — मोरपंखों की छड़ी धारण करने वाले। श्याम-भक्त बाबा के दर्शन में मोरपंख चढ़ाना शुभ मानते हैं।
इसी से जुड़ा एक और स्नेहिल नाम है “मोरवीनंदन” — माता मोरवी का पुत्र। यह नाम बाबा के उस कोमल पक्ष को छूता है जो वीरता और देवत्व से परे, एक माँ के लाडले का है। नामों में यही सौंदर्य है — कोई नाम शक्ति कहता है, कोई करुणा, और कोई केवल वात्सल्य।
लीले के असवार
“लीले के असवार” अर्थात नीले घोड़े ‘लीला’ पर सवार होने वाले। खाटू श्याम के अनेक चित्रों और भजनों में उन्हें अपने प्रिय नीले अश्व पर विराजमान दिखाया जाता है, हाथ में निशान लिए।
यह छवि भक्त के मन में एक रक्षक की है — वह वीर जो अपने घोड़े पर सवार होकर भक्त की पुकार सुनते ही दौड़ा चला आता है। फाल्गुन मेले की निशान यात्रा में यही भाव जीवित होता है, जब लाखों भक्त बाबा का निशान उठाकर खाटू की ओर चलते हैं।
हारे का सहारा
और अंत में वह नाम जो सब नामों का सार है — “हारे का सहारा”। श्रीकृष्ण के इसी वचन से बर्बरीक को कलियुग में पूजे जाने का वरदान मिला था — कि जो हारेगा, टूटेगा, थकेगा, उसका सहारा तू बनेगा।
बाकी सब नाम बाबा के रूप, शक्ति और लीला कहते हैं; यह नाम बाबा और भक्त के रिश्ते को कहता है। इसीलिए संकट के क्षण में भक्त के मुख से सबसे पहले यही पुकार निकलती है।
अनेक नाम, एक भाव
शीश के दानी, लखदातार, मोरछड़ी धारी, लीले के असवार, हारे का सहारा — ये सब अलग-अलग नाम एक ही सत्य की ओर इशारा करते हैं। जैसे एक ही सूर्य को सुबह, दोपहर और साँझ में अलग रंगों में देखा जाता है, वैसे ही एक ही श्याम को भक्त अपने भाव के अनुसार अलग नाम से पुकारता है।
नाम चाहे जो हो, पुकार सच्ची हो — बाबा हर नाम पर वही उत्तर देते हैं।
जिस नाम से पुकारो, वो दौड़े चले आएँ,श्याम धनी का यही तो स्वभाव कहलाए।