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खाटू श्याम
विशेष लेख · 7 मिनट

तीन बाणबर्बरीक की अमोघ शक्ति का रहस्य

‖ तीन बाण धारी — एक वरदान, एक मर्यादा, एक त्याग ‖

खाटू श्याम “तीन बाण धारी” क्यों कहलाते हैं — माँ से मिले तीन अमोघ बाण, उनका छिपा अर्थ, और वह संकल्प जिसने एक बालक को कलियुग का देवता बना दिया।

खाटू श्याम के अनेक चित्रों में बाबा के हाथ में अथवा उनके समीप तीन बाण दिखाई देते हैं। मोरपंखों से सजे उस मुखमंडल के साथ ये तीन बाण इतने स्वाभाविक लगते हैं कि अधिकांश भक्त रुक कर पूछते ही नहीं — ये तीन बाण क्यों? और इन्हीं के कारण बाबा को “तीन बाण धारी” क्यों कहा जाता है?

उत्तर एक छोटी-सी कथा में है, पर उस कथा के भीतर एक बड़ा सूत्र छिपा है — शक्ति का सबसे ऊँचा प्रयोग उसे चलाने में नहीं, उसे रोक लेने में है।

माँ का वरदान

बर्बरीक बाल्यकाल से ही असाधारण थे। भीम के पौत्र, घटोत्कच और माता मोरवी (अहिलावती) के पुत्र — उनकी रगों में वीरता स्वाभाविक थी। पर उन्होंने उस वीरता को तप से और तराशा।

कठोर साधना से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें तीन ऐसे बाण प्रदान किए जो साधारण नहीं थे। कहा जाता है कि इन तीन बाणों में सम्पूर्ण सृष्टि को साधने और फिर पुनः स्थापित करने की शक्ति थी। पहला बाण उन सब वस्तुओं को चिह्नित कर देता जिन्हें नष्ट करना हो; दूसरा बाण उन सबको चिह्नित करता जिन्हें बचाना हो; और तीसरा बाण क्षण भर में वह सब कार्य पूर्ण कर देता।

इसी कारण बर्बरीक “तीन बाण धारी” कहलाए — एक ऐसा योद्धा जिसके लिए तीन बाण ही सम्पूर्ण शस्त्रागार के समान थे।

तीन बाण, तीन अर्थ

जो भक्त इस कथा पर ठहरते हैं, उन्हें इन तीन बाणों में केवल अस्त्र नहीं, एक दर्शन दिखाई देता है।

पहला बाण — विवेक। वह दृष्टि जो ठीक-ठीक जानती है कि जीवन में क्या त्यागने योग्य है। दूसरा बाण — करुणा। वह भाव जो जानता है कि किसे बचाना है, किसे सहेजना है। और तीसरा बाण — संकल्प। वह शक्ति जो विवेक और करुणा के निर्णय को पूर्ण कर देती है।

जिसके पास ये तीनों हों — सही को पहचानने का विवेक, रक्षा करने की करुणा, और कर दिखाने का संकल्प — उसे और किसी शस्त्र की आवश्यकता नहीं। यही बर्बरीक की शक्ति का असली रहस्य था।

जिसने शक्ति को मर्यादा दी

इतनी शक्ति का स्वामी होकर भी बर्बरीक ने एक असाधारण प्रतिज्ञा ली — वह महाभारत के उस पक्ष की ओर से लड़ेंगे जो हार रहा हो।

यह प्रतिज्ञा सुनने में सरल लगती है, पर इसके पीछे गहरी मर्यादा है। शक्ति का स्वाभाविक झुकाव विजेता की ओर होता है — सब बलवान के साथ खड़े होना चाहते हैं। बर्बरीक ने ठीक उल्टा संकल्प लिया: मेरी शक्ति कमज़ोर के साथ खड़ी होगी, गिरते हुए को थामेगी।

श्रीकृष्ण इस प्रतिज्ञा का परिणाम जानते थे — यदि बर्बरीक हारती हुई सेना से जुड़ जाते, तो युद्ध का संतुलन ही असम्भव हो जाता; हर पक्ष बारी-बारी से जीतता और हारता रहता, और संहार कभी समाप्त न होता। इसीलिए उन्होंने एक और मार्ग चुना।

बाण जो कभी नहीं चले

सबसे मार्मिक बात यह है कि सृष्टि को साध सकने वाले वे तीन बाण महाभारत के युद्ध में कभी चले ही नहीं।

ब्राह्मण वेश में आए श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से शीश का दान माँग लिया, और बर्बरीक ने बिना प्रश्न के अपना मस्तक अर्पित कर दिया। जिस वीर के पास तीनों लोकों को जीतने की शक्ति थी, उसने अपनी सबसे बड़ी विजय युद्ध में नहीं, समर्पण में पाई।

यही तीन बाणों का अंतिम अर्थ है — सबसे बड़ी शक्ति वह नहीं जो चल जाए, बल्कि वह जो भक्त के भले के लिए रोक ली जाए। बर्बरीक ने अपनी अमोघ शक्ति को अहंकार नहीं बनने दिया; उसे प्रभु के चरणों में रख दिया।

इसीलिए जब हम बाबा के चित्र में वे तीन बाण देखते हैं, तो वे केवल अस्त्र नहीं — वे उस संयम का स्मरण हैं जिसने एक बालक को कलियुग का देवता बना दिया।

आज के भक्त के लिए

तीन बाण धारी का यह दर्शन आज भी उतना ही जीवंत है। हम सबके पास किसी न किसी रूप में शक्ति है — वाणी की, धन की, पद की, ज्ञान की। प्रश्न यह नहीं कि हमारे पास शक्ति है या नहीं; प्रश्न यह है कि हम उसे किस ओर मोड़ते हैं।

बर्बरीक का जीवन कहता है — शक्ति को हारते हुए के साथ खड़ा करो, और जहाँ अहंकार बनने लगे, वहाँ उसे प्रभु के चरणों में रख दो।

तीन बाण धारी, मोरछड़ी धारी,
हारे का सहारा बने श्याम मुरारी।

‖ जय श्री श्याम ‖