श्री खाटू श्यामका इतिहास
‖ महाभारत से आधुनिक मंदिर तक ‖
द्वापर युग में बर्बरीक का शीश-दान, कलियुग में रूपसिंह चौहान का स्वप्न, गाय के दूध से शीश का प्रागट्य, और मारवाड़ी समाज द्वारा प्राचीन मंदिर का निर्माण — पाँच पर्वों में सम्पूर्ण इतिहास।
खाटू श्याम जी का इतिहास केवल एक मन्दिर की कथा नहीं — यह श्रीकृष्ण के उस वचन की पूर्ति है जो उन्होंने महाभारत के समय बर्बरीक को दिया था। हज़ारों वर्षों की यह यात्रा पाँच प्रमुख पर्वों में बाँटी जा सकती है।
- पर्व · ०१
द्वापर युग
महाभारत — बर्बरीक और शीश-दान
भीम-पौत्र, घटोत्कच-पुत्र, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर
खाटू श्याम जी की कथा का आरम्भ द्वापर युग में होता है। महाबली भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र — बर्बरीक — माँ अहिलावती के पुत्र थे। बाल्यकाल से ही उन्होंने माँ से शिक्षा और भगवती से तीन अमोघ बाणों का वर पाया, जिनके कारण उन्हें "तीन बाण धारी" कहा गया।
महाभारत युद्ध के समय बर्बरीक ने माँ को वचन दिया कि वे उस पक्ष की ओर से लड़ेंगे जो हार रहा हो। श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश में आकर उनकी परीक्षा ली और दान-स्वरूप उनका शीश माँग लिया। बर्बरीक ने हँसते हुए शीश काट कर अर्पित कर दिया — पर एक प्रार्थना की कि वे सम्पूर्ण युद्ध देख सकें।
श्रीकृष्ण ने उनके शीश को एक ऊँचे टीले पर स्थापित कर दिया, जहाँ से उन्होंने अठारह दिनों का सम्पूर्ण महाभारत युद्ध देखा। प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने वर दिया — "कलियुग में तुम मेरे ही नाम से, मेरे ही रूप में पूजे जाओगे। हारे का सहारा बनोगे।"
- पर्व · ०२
कलियुग का आरम्भ
रूपसिंह चौहान का स्वप्न
खाटू ग्राम · सीकर · राजस्थान
सहस्रों वर्ष बीत गए। कलियुग में राजस्थान के सीकर ज़िले के खाटू नामक छोटे से ग्राम में चौहान वंश के राजा रूपसिंह जी का राज्य था। एक रात उन्हें स्वप्न में दर्शन हुए — एक दिव्य पुरुष ने उन्हें एक विशेष स्थान बताया जहाँ उनका शीश भूमि के नीचे विद्यमान है, और उसका प्रागट्य करने का आदेश दिया।
रूपसिंह जी ने स्वप्न को अपनी रानी नर्मदा कुँवर को बताया। राजा-रानी दोनों श्याम भक्त थे, उन्होंने तत्काल उस स्थान की पहचान करनी आरम्भ की।
- पर्व · ०३
प्रागट्य
गाय का दूध और शीश का दर्शन
पवित्र भूमि से दिव्य प्रकाश
उसी समय खाटू ग्राम के गोपालक के पास एक विशेष लक्षण उत्पन्न हुआ। एक गाय प्रतिदिन एक निश्चित स्थान पर आकर अपने आप दूध की धारा बहा देती थी। गोपालक चकित होकर यह दृश्य कई दिनों तक देखता रहा।
जब यह बात राजा रूपसिंह तक पहुँची, उन्हें अपने स्वप्न का स्मरण हुआ। उन्होंने उसी स्थान पर खुदाई का आदेश दिया। थोड़ी ही गहराई पर एक दिव्य शीश प्रकट हुआ — मुस्कुराता हुआ, मोरपंख और तिलक से सुशोभित, अद्भुत तेजस्वी।
सम्पूर्ण ग्राम भक्ति-भाव से भर गया। यह वही शीश था जो श्रीकृष्ण ने महाभारत के समय बर्बरीक से दान में लिया था और कलियुग के लिए सुरक्षित रखा था।
- पर्व · ०४
प्राचीन मंदिर
मारवाड़ी समाज और प्रथम मन्दिर
विक्रम सम्वत् १७७७ — सन् १७२० के लगभग
राजा रूपसिंह जी ने उसी पवित्र स्थान पर एक छोटा-सा मन्दिर बनवाकर शीश की प्रतिष्ठा की। पर वास्तविक मन्दिर का निर्माण मारवाड़ी समाज के अग्रणी सेठों — विशेषतः अबीरचन्द कोठारी जी — के सहयोग से सम्पन्न हुआ।
सेठ अबीरचन्द कोठारी जी को भी श्याम बाबा के स्वप्न-दर्शन हुए थे। उन्होंने अपनी पूरी सम्पत्ति लगाकर खाटू में भव्य मन्दिर का निर्माण कराया। तभी से खाटू श्याम जी मारवाड़ी समाज के विशेष आराध्य बने।
विक्रम सम्वत् १७७७ (अनुमानित १७२० ईस्वी) में मन्दिर की प्रतिष्ठा हुई। तभी से प्रति वर्ष फाल्गुन शुक्ल की एकादशी से द्वादशी तक "लक्खी मेला" आयोजित होने लगा — जिसमें लाखों भक्त खाटू पधारते हैं।
- पर्व · ०५
जीर्णोद्धार
आधुनिक मन्दिर — १९७५
श्री श्याम मंदिर समिति · आधुनिक स्वरूप
समय के साथ मन्दिर का विस्तार होता गया। सन् १९७५ में मन्दिर का बड़े पैमाने पर जीर्णोद्धार और विस्तार किया गया। संगमरमर का सुन्दर गर्भगृह, चौड़ा प्रांगण, अनेक प्रवेश द्वार, और भक्तों के लिए विशाल विश्रामगृह बनाए गए।
आज मन्दिर का संचालन "श्री श्याम मंदिर समिति" करती है। प्रतिदिन पाँच आरतियाँ होती हैं, फाल्गुन मेले में दो सप्ताह तक लाखों भक्तों का आगमन होता है, और शुक्ल पक्ष की एकादशी एवं द्वादशी पर विशेष दर्शन होते हैं।
खाटू नगर के विकास में मन्दिर का योगदान अमूल्य है। आज यह स्थान न केवल राजस्थान का, अपितु सम्पूर्ण भारत का प्रमुख तीर्थस्थल है — जहाँ "हारे का सहारा" अपने भक्तों की प्रतीक्षा करते हैं।
‖ हारे का सहारा ‖
श्रीकृष्ण के वचन की पूर्ति में श्याम बाबा कलियुग के कण-कण में विद्यमान हैं — जो भी हारा हुआ, थका हुआ, टूटा हुआ भक्त उन्हें पुकारता है, श्याम बाबा सहारा देते हैं।
