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खाटू श्यामEN
कथा संग्रह · प्रथम पर्व

महाभारत केबर्बरीक

भीम के पौत्र · घटोत्कच के पुत्र · सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर

बर्बरीक — जिनका जन्म असाधारण तप से हुआ, जिनके तीन बाण किसी भी युद्ध को क्षण भर में समाप्त कर सकते थे, जो “हारे का साथ” देने का व्रत लेकर महाभारत के युद्धभूमि की ओर बढ़े। यह कथा उनके जन्म, साधना और प्रतिज्ञा की है।

॥ पर्व · ०१
०१

जन्म व वंशावली

महाभारत काल में पाण्डवों के मध्यम भ्राता भीमसेन की एक विशेष संतान हुई — घटोत्कच, जो हिडिम्बा से उत्पन्न महान वीर थे। घटोत्कच का विवाह नाग-कन्या मौर्वी से हुआ, जिन्हें कुछ ग्रंथों में अहिलावती के नाम से भी जाना जाता है। उनके पुत्र हुए — बर्बरीक।

बालक बर्बरीक का स्वरूप अद्भुत था — तेजस्वी, बलवान, और बाल्यकाल से ही धनुर्विद्या की ओर प्रबल रुचि रखने वाला। जब वे अपनी माता मौर्वी की गोद में बैठते, तो माता को आभास होता कि यह बालक साधारण नहीं, अपितु किसी विशेष प्रयोजन के लिए जन्मा है।

तीन पीढ़ियों की वीरता बर्बरीक में संचित थी — पाण्डवों का धर्म, भीम का बल, घटोत्कच की राक्षस-शक्ति, और मौर्वी की नाग-तेज। यही चार धाराएँ मिलकर एक ऐसा वीर बनीं जिसकी क्षमता का पूर्ण दर्शन समस्त सृष्टि के लिए चकित कर देने वाला था।

०२

माँ का कुलधर्म और प्रतिज्ञा

जब बर्बरीक कुछ बड़े हुए और शस्त्र-विद्या में निपुण होने लगे, तब माता मौर्वी ने उन्हें अपने पास बुलाकर कुलधर्म का व्रत दिया — “पुत्र, तुम जब भी युद्धभूमि में जाओगे, सदा हारे हुए पक्ष का साथ देना। जो दुर्बल हो, जो पराजित हो रहा हो, उसी की रक्षा करना। यही हमारा कुलधर्म है।”

बर्बरीक ने यह वचन शिरोधार्य किया। इस एक प्रतिज्ञा ने उनके भविष्य का सम्पूर्ण दिशा-निर्धारण कर दिया — और आगे चलकर यही प्रतिज्ञा महाभारत के संदर्भ में एक असाधारण दुविधा का कारण बनने वाली थी।

०३

घोर तप व तीन अमोघ बाण

अपने कुलधर्म के निर्वाह हेतु बर्बरीक ने जान लिया कि उन्हें अद्वितीय शक्ति की आवश्यकता है। वे एकांत वन में चले गए और कठोर तप का आरम्भ किया। महीनों, वर्षों — उन्होंने अन्न-जल का त्याग कर भगवती दुर्गा (कुछ परंपराओं में भगवान शिव) का ध्यान किया।

देवी प्रसन्न हुईं और उन्हें तीन अमोघ बाण प्रदान किए। ये साधारण बाण नहीं थे — पहला बाण उन सब वस्तुओं को अंकित कर देता जिन्हें बर्बरीक नष्ट करना चाहते। दूसरा बाण उन सब वस्तुओं को अंकित करता जिन्हें वे रक्षित रखना चाहते। तीसरा बाण क्षण भर में पहले बाण द्वारा अंकित सब कुछ नष्ट कर देता और दूसरे बाण द्वारा अंकित सब कुछ अक्षत छोड़ देता।

इस वर के साथ बर्बरीक त्रिलोक के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बन गए। उनके सामने अब कोई युद्ध दीर्घ नहीं रह सकता था — एक क्षण में निर्णय हो जाता।

०४

महाभारत की ओर प्रस्थान

जब महाभारत के युद्ध की घोषणा हुई और कुरुक्षेत्र में पाण्डव-कौरव की सेनाएँ आमने-सामने हुईं, तब बर्बरीक को इस ऐतिहासिक संग्राम की सूचना मिली। उन्होंने माता मौर्वी से अनुमति माँगी कि वे भी युद्धभूमि में जाएँ।

माता ने उन्हें फिर से कुलधर्म का स्मरण कराया — “हारे का साथ देना।” बर्बरीक ने वचन दिया कि वे माँ के व्रत के अनुसार ही कार्य करेंगे। अपने तीन बाण, अपना दिव्य धनुष, और एक नीला घोड़ा लेकर वे कुरुक्षेत्र की ओर चल पड़े।

पर बर्बरीक यह नहीं जानते थे कि उनकी इस यात्रा में स्वयं श्रीकृष्ण उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे — और एक ऐसी परीक्षा उनकी प्रतिक्षा में थी जो उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का परीक्षण करने वाली थी। यह कथा अगले पर्व में।

॥ इति प्रथम पर्व — बर्बरीक का जन्म व प्रतिज्ञा ॥