हारे का सहारा।
ये तीन शब्द जब कोई पहली बार सुनता है, तो लगते हैं एक उपाधि — खाटू बाबा के अनेक नामों में से एक। पर जो भक्त खाटू तक की राह नाप चुका है, जिसकी आँखें कभी बाबा के द्वार पर भीगी हैं, वह जानता है कि यह केवल नाम नहीं — यह एक वचन है। उन सबके लिए जो जीवन में कभी टूटे हैं, हारे हैं, अकेले हुए हैं — और जिन्हें फिर भी हर सुबह उठकर चलना है।
बर्बरीक हार कर भी जीते थे। महाभारत के मैदान में जिन्होंने अपना शीश तक दे दिया, उन्हें भगवान कृष्ण ने कलियुग के देवता का वरदान दिया। पर इसके पीछे एक गहरा सूत्र छुपा था — जो अपना सब कुछ खो देता है, उसी को बाबा अपना सब कुछ दे देते हैं। और जो दूसरों के टूटे हुए मन को सहारा देने आगे आ जाता है, वही "हारे का सहारा" कहलाता है।
जिसने अपना शीश दे दिया
बर्बरीक की कथा बहुतों ने सुनी है, पर कम लोग रुक कर सोचते हैं कि उस कथा में जो सबसे मार्मिक क्षण है, वह कौन सा है।
बर्बरीक भीम के पौत्र थे — घटोत्कच और अहिलावती के पुत्र। तीन बाण उन्हें माँ नवदुर्गा से वरदान में मिले थे — ऐसे बाण जो किसी भी युद्ध को पल में समाप्त कर सकते थे। महाभारत का युद्ध जब घोषित हुआ, उन्होंने तय किया कि वह उस पक्ष की ओर लड़ेंगे जो हार रहा हो।
यह तय कर लेना ही उनके चरित्र की पहली चमक थी — कि शक्ति का प्रयोग कमज़ोर के साथ खड़े होने में होगा, विजेता के लिए नहीं।
भगवान कृष्ण को यह बात पहले से ज्ञात थी। और इसी कारण उन्होंने ब्राह्मण का वेश धारण कर बर्बरीक से शीश का दान माँग लिया। बर्बरीक ने एक क्षण के लिए भी प्रश्न नहीं किया। सिर्फ़ इतना कहा — "प्रभु, यदि आप माँगते हैं, तो दे देता हूँ।" और अपना शीश काट कर श्रीकृष्ण के चरणों में रख दिया।
बस — यहीं वह क्षण है।
जिसने अपना सबसे प्रिय — अपना अस्तित्व — दे दिया हो बिना प्रश्न के, उसे फिर ब्रह्मांड क्या नहीं देगा? कृष्ण ने तुरंत वरदान दिया कि बर्बरीक कलियुग में श्याम के रूप में पूजे जाएँगे। उनका कटा हुआ शीश एक पहाड़ी पर स्थापित कर दिया गया ताकि वह सम्पूर्ण महाभारत युद्ध देख सकें। और बाद में, कलियुग के आरंभ में, यही शीश राजस्थान के खाटू ग्राम में एक कुएँ से प्रकट हुआ।
जो हारे को सहारा देने आये थे, वही स्वयं "हारे का सहारा" बन गये।
हारा कौन — और हार क्या?
हिन्दी में "हारा" शब्द बहुत गहरा है। यह केवल हार का अनुवाद नहीं — यह उससे कहीं अधिक है।
हारा वो है जो थक चुका है। जिसका अहंकार टूट चुका है। जिसने अपनी हर युक्ति आज़मा ली और अब चुप हो गया है। हारा वो है जो दुनिया के सामने हाथ जोड़ देता है — पर भगवान के सामने वह असली रूप में खड़ा होता है, बिना मुखौटे के।
यह "हार" कमज़ोरी नहीं है। यह वह दरार है जिससे प्रकाश भीतर आता है। राजा की प्रार्थना में बहुत शब्द होते हैं — गरीब की प्रार्थना में सिर्फ़ आँसू। और कौन सी प्रार्थना भगवान तक पहुँचती है, यह वही जानता है।
मीरा बाई ने गाया था — "मीरा को प्रभु गिरधर मिले।" पर मीरा को मिले क्यों? क्योंकि मीरा हारी हुई थीं — समाज से, परिवार से, संसार से। और जिस क्षण उन्होंने हार स्वीकार कर ली, उसी क्षण गिरधर सामने आ गये।
बर्बरीक का शीश-दान भी यही था — एक प्रकार की हार। पर ऐसी हार जो विजय से भी ऊँची थी। उन्होंने अपनी शक्ति, अपना अस्तित्व, अपना अहंकार — सब हार दिया एक क्षण में। और इसी हार ने उन्हें कलियुग का देवता बना दिया।
खाटू बाबा को "हारे का सहारा" कहलाने का यह दूसरा कारण है — क्योंकि उन्होंने हार का सच्चा अर्थ जिया है। वह जानते हैं कि टूटना क्या होता है।
जो भक्त हारे आये
खाटू के द्वार पर आज तक न जाने कितने लोग ऐसे आये हैं जो हारे हुए थे।
एक व्यापारी जिसका सारा कारोबार डूब गया — पैसा, साख, परिवार का विश्वास, सब कुछ। उसके पास कुछ नहीं बचा था सिवाय एक रेल टिकट के, जो उसके मामा ने खाटू तक के लिए दिया था। वह आया, बाबा के सामने रोया, और लौट गया। अगले कुछ महीनों में उसका नया छोटा-सा कारोबार धीरे-धीरे चलने लगा। आज वह हर फाल्गुन मेले में आता है, और अपने जैसे टूटे लोगों के लिए धर्मशाला में निःशुल्क भोजन की व्यवस्था करता है।
एक माँ जिसका बच्चा गम्भीर रूप से बीमार था। उस रात वह खाटू के कुएँ के पास बैठ कर रो रही थी। उसने न कुछ माँगा, न कुछ कहा — बस बैठी रही। आज भी हर एकादशी पर वह पैदल यात्रा करती है। ऐसी कितनी ही माँएँ हैं, ऐसी कितनी ही रातें।
एक युवक जिसकी ज़िंदगी से मक़सद ही खो गया था। नौकरी से निकाला गया, दोस्त छूट गये, माँ-बाप दूर थे। उसने सोचा था कि शायद यही अंत है। फिर उसके दादाजी ने उसे रींगस से पैदल खाटू तक चलने भेजा। उस अठारह किलोमीटर की चढ़ाई में उसने जो सोचा, और बाबा के सामने जो रोया, वह उसकी ज़िंदगी का सबसे ईमानदार क्षण था। उसके बाद की राह उसने स्वयं चुनी।
ये कहानियाँ अलग-अलग पीढ़ियों में बार-बार दोहराई जाती हैं। मारवाड़ी समाज में "खाटू का दर्शन" लगभग एक मुहावरा है — जब कोई जीवन के किसी मोड़ पर हार रहा हो, परिवार के बुज़ुर्ग धीरे से कहते हैं — "एक बार बाबा से मिल आ।"
सेठ अबीरचन्द कोठारी की कथा भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी है। एक स्वप्न में उन्हें बाबा के दर्शन हुए, और उसके बाद उन्होंने अपनी व्यापारिक सम्पत्ति का बड़ा भाग लगा कर मन्दिर के पुनर्निर्माण में योगदान दिया। मारवाड़ी समाज में आज भी कहा जाता है — "जो सेठ खाटू वाले बाबा को अपना सेठ मान ले, उसका कुछ नहीं बिगड़ता।"
कलियुग और हार
आज के समय में हार के अनेक रूप हैं।
कोई नौकरी छिन गयी है। किसी का घर बँट गया है। कोई बीमार है और दवा का खर्च नहीं उठा सकता। कोई अकेला है इतने भीड़ भरे शहर में कि सोते समय भी आँसू सूख नहीं पाते। कोई इतना थक गया है रोज़ की लड़ाई से कि हँसना भी एक प्रयास हो गया है।
यह कलियुग की पहचान है — हर इंसान भीतर से किसी न किसी मोर्चे पर लड़ रहा है, और हर एक की कहीं न कहीं हार हो रही है।
खाटू का बाबा इसी कलियुग के लिए प्रकट हुए हैं। इसीलिए कृष्ण ने उन्हें कलियुग के देवता का वरदान दिया था — क्योंकि कलियुग में हारे हुए सबसे अधिक होंगे, और उन्हें एक ऐसा देव चाहिए था जो उनकी भाषा समझे। जो स्वयं हार कर देखा हो। जिसके सामने भक्त बिना मुखौटे के खड़ा हो सके।
खाटू में हर सप्ताह लाखों लोग आते हैं। मेले में करोड़ों। और इन सब में बहुत थोड़े ऐसे होते हैं जो केवल "देखने" आते हैं। अधिकांश आते हैं — "देखे जाने" — कि एक बार बाबा उन्हें देख लें। बस इतनी सी प्रार्थना।
जब आप बाबा के सामने हाथ जोड़ कर खड़े होते हैं, तो आपकी सबसे गहरी हार सबसे पहले उठती है। आपको कुछ कहना भी नहीं पड़ता। बाबा को मालूम है।
यही सहारा है।
जो वचन खाटू में जीवित है
खाटू केवल एक स्थान नहीं — यह एक वचन है जो अभी भी हर रोज़ निभाया जा रहा है।
हर सुबह की मंगला आरती में, हर शाम की शयन आरती में, हर एकादशी की भीड़ में, हर फाल्गुन के मेले की निशान यात्रा में — एक ही बात दोहराई जाती है: "हारे का सहारा।"
केसरिया निशाण जो हर मेले में लाखों भक्त रींगस से खाटू तक उठा कर ले जाते हैं — वह केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं। वह घोषणा है। कि हम भी हारे हैं, और हमें भी सहारा मिला है। और जो हमें मिला है, उसकी गवाही देने हम ये निशान ले कर चल रहे हैं।
जो खाटू नहीं पहुँच सकते, उनके लिए भी बाबा ने रास्ता खुला रखा है। मन्दिर समिति की ओर से हर आरती का सीधा प्रसारण होता है, ताकि एक भी भक्त "देखे जाने" से रह न जाये। आज तकनीक ने उस वचन को और दूर तक पहुँचा दिया है — पर मूल बात वही है। हारे को सहारा देना।
अगर आप ये पढ़ रहे हैं
अगर आज आप ये पंक्तियाँ पढ़ रहे हैं, तो शायद कहीं भीतर एक कोना है जो थका हुआ है। कोई भार है जिसे आप अकेले उठाते-उठाते थक गये हैं। कोई बात है जो किसी से कह नहीं सकते।
खाटू के बाबा को कह दीजिये। उन्हें कुछ बताने की आवश्यकता नहीं — वह सब जानते हैं। बस एक बार कहिये — "बाबा, मैं हारा हूँ। अब तू सम्भाल।"
जिस क्षण आप यह कह देते हैं, सहारा वहाँ खड़ा होता है। दूर बैठे, पर बहुत पास।
हारे का सहारा कहलाये बाबा श्याम,तीनों लोक में फैला उनका नाम।