पौष पुत्रदाएकादशी
‖ १८ जनवरी २०२७ (सोमवार) ‖
पौष शुक्ल एकादशी — सन्तान-सुख देने वाली "पुत्रदा" एकादशी। वर्ष में दो पुत्रदा एकादशी आती हैं; यह पौष मास वाली है, दूसरी श्रावण में।
पौष पुत्रदा एकादशी पौष माह के शुक्ल पक्ष में, शीत ऋतु में आती है। निःसन्तान दम्पति सन्तान-प्राप्ति की कामना से, और माता-पिता अपनी सन्तान के कल्याण की प्रार्थना से यह व्रत रखते हैं। परम्परा में "पुत्र" शब्द यहाँ सन्तान मात्र के लिए है — बेटा हो या बेटी।
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राजा सुकेतुमान की कथा
भविष्य पुराण की कथा के अनुसार भद्रावती नगरी के राजा सुकेतुमान निःसन्तान थे और इसी दुःख से व्यथित होकर वन चले गए। भटकते हुए वे एक सरोवर के किनारे ऋषियों के आश्रम पहुँचे — उस दिन पौष शुक्ल एकादशी थी। ऋषियों के कहने पर राजा ने पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी को पारण किया। इसी व्रत के प्रभाव से उन्हें सन्तान-सुख प्राप्त हुआ।
- ०२
दो पुत्रदा एकादशी
वर्ष में पुत्रदा नाम की दो एकादशी आती हैं — एक पौष शुक्ल में और दूसरी श्रावण शुक्ल में। दोनों का फल और भाव एक ही है: सन्तान-प्राप्ति और सन्तान का कल्याण। उत्तर भारत में पौष वाली पुत्रदा अधिक प्रचलित है, जबकि दक्षिण भारत में श्रावण वाली।
- ०३
बाबा के दरबार में मनोकामना
श्री खाटू श्याम जी श्रीकृष्ण के ही कलियुगी रूप हैं और एकादशी विष्णु-कृष्ण की प्रिय तिथि है। "हारे का सहारा" के दरबार में सन्तान की कामना लेकर आने वाले भक्त इस एकादशी पर बाबा का स्मरण करते हुए व्रत रखते हैं — यह श्रद्धा और धैर्य से प्रार्थना करने की तिथि है।
- ०१
दशमी की रात्रि से सात्त्विक आहार, संयम और ब्रह्मचर्य।
- ०२
एकादशी प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु / श्याम बाबा का पूजन; पति-पत्नी साथ मिलकर संकल्प लें तो शुभ।
- ०३
तुलसी दल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पण; विष्णु-सहस्रनाम अथवा श्याम-स्तवन का पाठ।
- ०४
दिनभर निराहार अथवा फलाहार व्रत; रात्रि-जागरण और दीप-दान विशेष फलदायी माने जाते हैं।
- ०५
द्वादशी प्रातः स्नान-पूजन कर, बच्चों को भोजन अथवा मिठाई बाँटकर पारण।
पौष पुत्रदा एकादशी — सामान्य प्रश्न
- ०१
पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत क्यों रखा जाता है?
यह व्रत सन्तान-प्राप्ति और सन्तान के कल्याण की कामना से रखा जाता है। भविष्य पुराण की कथा के अनुसार निःसन्तान राजा सुकेतुमान को इसी व्रत के प्रभाव से सन्तान-सुख मिला था।
- ०२
पौष पुत्रदा और श्रावण पुत्रदा एकादशी में क्या अन्तर है?
दोनों का नाम, फल और भाव एक ही है — सन्तान-सुख। अन्तर केवल मास का है: एक पौष शुक्ल एकादशी को आती है और दूसरी श्रावण शुक्ल एकादशी को।
- ०३
क्या यह व्रत केवल पुत्र के लिए है?
नहीं। "पुत्रदा" शब्द परम्परा में सन्तान मात्र के लिए प्रयुक्त होता है — बेटा हो या बेटी, दोनों की कामना और कल्याण के लिए यह व्रत रखा जाता है।
