साल में एक बार खाटू का छोटा-सा गाँव एक महासागर में बदल जाता है। फाल्गुन मास की शुक्ल एकादशी आते-आते खाटू की ओर जाने वाली हर सड़क केसरिया रंग में डूब जाती है — पैदल चलते भक्त, हाथों में निशान, ज़बान पर “जय श्री श्याम”।
यह फाल्गुन का लक्खी मेला है — खाटू श्याम का सबसे बड़ा उत्सव, जिसमें लाखों भक्त देश के कोने-कोने से आकर बाबा के दरबार में हाज़िरी लगाते हैं।
“लक्खी” क्यों कहलाता है
“लक्खी” शब्द “लाख” से बना है — वह मेला जिसमें लाखों लोग जुटें। और यह नाम अतिशयोक्ति नहीं; फाल्गुन मेले के दिनों में खाटू में पहुँचने वाले भक्तों की संख्या सचमुच लाखों में होती है, कुछ वर्षों में तो दसियों लाख तक।
मेला मुख्यतः फाल्गुन शुक्ल एकादशी से द्वादशी के आसपास अपने चरम पर होता है, यद्यपि भक्तों का आना कई दिन पहले से आरम्भ हो जाता है। आने वाले वर्ष की तिथियों और व्यवस्था का विवरण फाल्गुन मेला पृष्ठ पर देखा जा सकता है।
यही वह तिथि है जिसे बाबा के खाटू में प्रकट होने से जोड़ा जाता है — इसलिए फाल्गुन का यह उत्सव केवल मेला नहीं, बाबा के प्राकट्य का वार्षिक स्मरण भी है।
निशान की यात्रा
मेले की आत्मा है “निशान”। निशान एक केसरिया (अथवा रंग-बिरंगा) ध्वज है जिसे भक्त एक लम्बे डंडे पर बाँधकर अपने कंधे पर उठाते हैं और खाटू तक पैदल ले जाकर मन्दिर के शिखर पर चढ़ाते हैं।
यह निशान केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं — यह एक घोषणा है। भक्त इसे उठाकर मानो कहता है, “मैं भी बाबा के दरबार का हूँ, और मेरी मनोकामना उनके चरणों तक पहुँच रही है।” कोई निशान मन्नत पूरी होने के आभार में उठाता है, कोई नई प्रार्थना के संकल्प के साथ।
लाखों निशानों का यह जुलूस जब रात के अँधेरे में दीपों और भजनों के साथ खाटू की ओर बढ़ता है, तो वह दृश्य किसी भी देखने वाले के रोंगटे खड़े कर देता है।
रींगस से खाटू — अठारह किलोमीटर पैदल
मेले की सबसे प्रसिद्ध परम्परा है रींगस से खाटू तक की पैदल यात्रा — लगभग अठारह किलोमीटर का मार्ग, जिसे अनेक भक्त नंगे पाँव तय करते हैं।
रींगस तक रेल अथवा सड़क से पहुँचकर भक्त वहाँ से पैदल चल पड़ते हैं। मार्ग में जगह-जगह सेवा-शिविर लगते हैं — कोई जल पिलाता है, कोई भोजन कराता है, कोई थके पाँवों की मालिश करता है। पूरा रास्ता एक चलती-फिरती भक्ति-नगरी बन जाता है।
यह पैदल यात्रा केवल दूरी तय करना नहीं — यह स्वयं एक साधना है। हर कदम पर अहंकार थोड़ा और गलता है, और खाटू पहुँचते-पहुँचते भक्त भीतर से हल्का, विनम्र और बाबा के और निकट अनुभव करता है।
भीड़ में भी एक-एक की पुकार
लाखों की उस भीड़ में सबसे विस्मयकारी बात यह है कि वहाँ हर भक्त अपने आप को अकेला, बाबा के सामने खड़ा अनुभव करता है। भीड़ बाहर है; भीतर तो केवल वही है और उसका श्याम।
जो भक्त इस मेले में नहीं पहुँच पाते, वे भी इन दिनों घर से ही बाबा से जुड़ते हैं — लाइव दर्शन के माध्यम से मेले की आरती और दर्शन का भाव-लाभ लेते हैं।
बाबा के खाटू में प्रकट होने की पूरी कथा खाटू में प्रकट्य में पढ़ी जा सकती है — और उसे जानकर इस मेले का भाव और गहरा हो जाता है।
मेले का सन्देश
फाल्गुन का लक्खी मेला हमें सिखाता है कि आस्था कोई एकांत की वस्तु नहीं — वह बाँटने से बढ़ती है। लाखों अजनबी जब एक ही नाम पर, एक ही राह पर, एक ही भाव से चलते हैं, तो वे एक परिवार बन जाते हैं।
और इस पूरे जनसमुद्र के केंद्र में वही एक वचन खड़ा है — हारे का सहारा। जो भी इस मेले में थका-हारा आता है, बाबा उसे सहारा देकर ही लौटाते हैं।
फाल्गुन में सजे खाटू नगरी सारी,निशान लिए चले भक्त, बलिहारी।