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खाटू श्यामEN
कथा संग्रह · तृतीय पर्व

खाटू मेंप्रकट्य

गाय का दूध · राजा का स्वप्न · कलियुग के देवता का अवतरण

महाभारत के युद्धोपरांत बर्बरीक का शीश पवित्र भूमि में निहित हुआ। कलियुग में, खाटू ग्राम में, एक गाय के दूध और एक राजा के स्वप्न से वह शीश पुनः प्रकट हुआ — और श्याम बाबा का धाम स्थापित हुआ।

॥ पर्व · ०३
०१

युद्ध के बाद का शीश

महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ। पाण्डवों की विजय और धर्म की स्थापना के साथ, बर्बरीक के दान-शीश ने अपना उद्देश्य पूर्ण किया — सम्पूर्ण युद्ध की वह साक्षी रहा। श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार, उस पवित्र शीश को रूपवती नदी के तट पर एक स्थान में निहित कर दिया गया।

यह स्थान बाद में राजस्थान के सीकर जिले का खाटू ग्राम कहलाया। शीश भूमि में लीन रहा — सदियों तक, युगों तक — जब तक कलियुग का वह विशेष क्षण नहीं आया जब उसे पुनः प्रकट होना था।

०२

गाय और दूध की लीला

कलियुग के प्रारम्भ काल में खाटू ग्राम के निकट एक चरवाहा प्रतिदिन अपनी गायों को चराने के लिए ले जाता था। उन गायों में एक श्वेत गाय थी — विशेष, शान्त, अति प्रिय।

चरवाहा प्रतिदिन देखता कि वह गाय एक विशेष स्थान पर पहुँचकर रुक जाती है, और उस स्थान पर अपना दूध स्वयं ही धरा पर बहा देती है। दूध की धारा भूमि में समा जाती। चरवाहे को यह आश्चर्यजनक लीला समझ नहीं आई।

उसने अपने गाँव-वालों को इस लीला के बारे में बताया। ब्राह्मण और बुजुर्ग वहाँ पहुँचे, उस स्थान का अध्ययन किया। एक ब्राह्मण ने कहा — “यह स्थान दिव्य है। यहाँ अवश्य कुछ पवित्र निहित है।”

०३

खुदाई और शीश का प्रकट्य

गाँव-वासी और ब्राह्मण मिलकर उस स्थान पर खुदाई के लिए तैयार हुए। श्रद्धा और संकल्प के साथ कुदाली चली। कुछ गहराई तक खुदाई करने पर उन्हें एक चमकती हुई वस्तु दिखाई दी।

और गहरा खोदा गया — और तब प्रकट हुआ बर्बरीक का दिव्य शीश। तेजोमय, अक्षत, मुस्कुराता हुआ। मुख पर वही शान्ति थी जो शीश-दान के समय श्रीकृष्ण ने देखी थी। मानो सहस्रों वर्षों का समय बीत ही न हो।

गाँव-वासी विस्मित और भक्तिभाव में लीन हो गए। शीश को बड़े सम्मान से एक स्थान पर रख दिया गया, और उसकी पूजा-अर्चना प्रारम्भ हुई।

०४

राजा का स्वप्न और मंदिर की स्थापना

उन्हीं दिनों खाटू ग्राम के समीप का प्रदेश चौहान राजा रूपसिंह के अधीन था। एक रात्रि उन्हें एक दिव्य स्वप्न आया — स्वयं श्रीकृष्ण के साथ बर्बरीक उनके सामने प्रकट हुए और कहा — “हे राजन्, मेरा शीश खाटू में प्रकट हुआ है। वहाँ मेरे लिए एक मंदिर बनवाओ। मैं कलियुग में यहीं से अपने भक्तों की पुकार सुनूँगा।”

राजा रूपसिंह तत्काल खाटू पहुँचे। शीश का दर्शन कर वे अभिभूत हो गए। उन्होंने सम्पूर्ण आस्था और राजकीय सहायता से उसी स्थान पर एक मंदिर का निर्माण आरम्भ करवाया।

सूत्रों के अनुसार, यह मंदिर लगभग १०२७ ईस्वी सन में पूर्ण हुआ। शीश की स्थापना उसी वेदी पर हुई जहाँ आज भी श्याम बाबा विराजमान हैं। तभी से खाटू ग्राम “श्याम धाम” कहलाने लगा, और बर्बरीक का जो वरदान श्रीकृष्ण से प्राप्त हुआ था — “कलियुग में श्याम के नाम से पूजे जाओगे” — वह सत्य रूप में फलित हुआ।

०५

कलियुग में श्याम-धारा

खाटू में मंदिर की स्थापना के बाद से सहस्राब्दियों तक श्याम बाबा की महिमा बढ़ती ही गई। राजपूत, गुर्जर, मारवाड़ी, और सम्पूर्ण उत्तर-भारत से भक्तगण खाटू पहुँचने लगे। फाल्गुन शुक्ल एकादशी के मुख्य आरती दिवस पर लाखों भक्तों का संगम होने लगा — आज जिसे “लाखी मेला” कहा जाता है।

श्याम बाबा का यश “हारे के सहारा” के रूप में फैला। जो भी जीवन में पराजित हुआ, टूटा हुआ, निराश हुआ — वह खाटू पहुँचा, और लौटा एक नई आशा के साथ। यह व्रत श्रीकृष्ण ने जो बर्बरीक को दिया था, वह आज भी खाटू में जीवित है।

इस प्रकार, बर्बरीक से लेकर खाटू श्याम तक की यह तीन-पर्व यात्रा सम्पूर्ण हुई — जन्म से, शीश-दान से, और कलियुग के पुनर्प्रकट्य तक। जय श्री श्याम।

॥ इति तृतीय पर्व — खाटू श्याम का प्रकट्य ॥