योगिनीएकादशी
‖ ३० जून २०२७ (बुधवार) ‖
आषाढ़ कृष्ण एकादशी — जिसके व्रत का फल शास्त्रों में अट्ठासी हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने के तुल्य बताया गया है। वर्षा ऋतु के द्वार पर आने वाली यह एकादशी रोग-मुक्ति और पाप-क्षय की तिथि मानी जाती है।
योगिनी एकादशी आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष में आती है — देवशयनी एकादशी से ठीक पहले, जब वर्षा ऋतु का आरम्भ होता है। इस व्रत की कथा कुबेर के माली हेममाली से जुड़ी है, और श्याम-भक्तों के लिए यह मानसून-पूर्व बाबा के शान्त, निकट दर्शन का अवसर है।
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अट्ठासी हज़ार ब्राह्मण-भोज का पुण्य
पद्म पुराण के अनुसार योगिनी एकादशी का व्रत अट्ठासी हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर फल देता है। यह पापों का क्षय करने वाली और रोगों से मुक्ति दिलाने वाली एकादशी मानी गई है।
- ०२
हेममाली की कथा
कुबेर का माली हेममाली शिव-पूजा के पुष्प लाने में प्रमाद कर बैठा और शाप से कुष्ठ रोगी हुआ। महर्षि मार्कण्डेय के परामर्श पर उसने योगिनी एकादशी का व्रत रखा और रोग-मुक्त होकर अपना स्वरूप पुनः पाया — इसी से यह व्रत रोग-नाश के लिए विशेष माना जाता है।
- ०३
खाटू में योगिनी एकादशी
फाल्गुन मेले की भीड़ से दूर, आषाढ़ की यह एकादशी खाटू श्याम मन्दिर में शान्त और अन्तरंग होती है — भक्त सुगमता से बाबा के निकट दर्शन पाते हैं। एकादशी की सन्ध्या पर भजन-कीर्तन की परम्परा यहाँ भी पूरे भाव से निभती है।
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दशमी की रात्रि से सात्त्विक आहार और संयम का पालन।
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एकादशी प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु/श्याम बाबा का पूजन और व्रत का संकल्प।
- ०३
दिनभर फलाहार अथवा निराहार व्रत — सामर्थ्य अनुसार; भजन-स्मरण में दिन बिताएँ।
- ०४
पीपल पूजन व रोगियों की सेवा — इस एकादशी पर विशेष पुण्यकारी मानी जाती है।
- ०५
द्वादशी प्रातः स्नान-पूजन कर पारण और यथाशक्ति अन्न-दान।
योगिनी एकादशी — सामान्य प्रश्न
- ०१
योगिनी एकादशी का व्रत क्यों रखा जाता है?
योगिनी एकादशी का व्रत पाप-क्षय और रोग-मुक्ति के लिए रखा जाता है। पद्म पुराण में इसका फल अट्ठासी हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने के तुल्य बताया गया है।
- ०२
योगिनी एकादशी की कथा क्या है?
कुबेर का माली हेममाली शिव-पूजा के पुष्प लाने में चूक कर शापवश कुष्ठ रोगी हुआ। महर्षि मार्कण्डेय के परामर्श पर उसने योगिनी एकादशी का व्रत रखा और रोग से मुक्त होकर अपना स्वरूप पुनः पाया।
- ०३
योगिनी एकादशी कब आती है?
योगिनी एकादशी आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष में आती है — निर्जला एकादशी के बाद और देवशयनी एकादशी (चातुर्मास आरम्भ) से ठीक पहले।
