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खाटू श्यामEN
उत्सव · शरद पूर्णिमा

शरदपूर्णिमा

‖ अश्विन शुक्ल पूर्णिमा · २६ अक्टूबर २०२६ ‖

रास-निशा — वह दिव्य रात्रि जब चन्द्रमा अपनी सम्पूर्ण कलाओं से अमृत बरसाता है। खाटू श्याम मन्दिर में कृष्ण की रास-लीला, सम्पूर्ण रात्रि भजन, और चन्द्रमा के नीचे रखी अमृत-खीर का पावन पर्व।

शरद पूर्णिमा वर्ष की उन कुछ रात्रियों में से एक है जब चन्द्रमा सोलह कलाओं से युक्त होता है। यह कोजागरी पूर्णिमा भी कही जाती है, और मारवाड़ी परम्परा में लक्ष्मी-स्वागत से भी जुड़ी है — पर खाटू श्याम भक्तों के लिए इसका विशेष अर्थ कृष्ण की रास-लीला और बाबा की एकता में निहित है।

महत्व

शरद पूर्णिमा क्यों विशेष?

  1. ०१

    रास-निशा — कृष्ण की दिव्य लीला

    शरद पूर्णिमा को "रास-निशा" कहा जाता है — वह रात्रि जब श्रीकृष्ण ने वृन्दावन में गोपियों के साथ महारास का आयोजन किया था। चन्द्रमा अपनी सम्पूर्ण कलाओं से युक्त इस रात्रि में पृथ्वी पर अमृत बरसाता है, ऐसा शास्त्रीय वर्णन है।

  2. ०२

    खीर और चन्द्र-किरणें

    पारम्परिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि चन्द्रमा से अमृत-तुल्य औषधीय किरणें निकलती हैं। इसलिए दूध-चावल की खीर रात्रि भर खुले आकाश में चाँदनी के नीचे रखी जाती है, और प्रातः बाबा को भोग के बाद प्रसाद-स्वरूप ग्रहण की जाती है।

  3. ०३

    कृष्ण-श्याम की एकता

    श्री खाटू श्याम जी कृष्ण के ही कलियुगी रूप हैं। अतः शरद पूर्णिमा का रास-लीला उत्सव बाबा के मन्दिर में भी विशेष रूप से मनाया जाता है — रात्रि-भजन, खीर-प्रसाद, और सम्पूर्ण रात्रि-दर्शन की परम्परा है।

परम्परा

खाटू मन्दिर का कार्यक्रम

  1. चरण · ०१

    दिनभर व्रत और स्मरण

    भक्त दिन भर सात्विक भोजन या फलाहार पर रहते हैं। दिन में बाबा का स्मरण, चालीसा का पाठ, और भजन-कीर्तन की परम्परा है।

  2. चरण · ०२

    खीर-निर्माण की विशेष विधि

    गाय का दूध, चावल, मिश्री, इलायची, और सूखे मेवों से खीर तैयार की जाती है। बाबा को प्रथम भोग अर्पित करने के पश्चात पात्र को रात्रि भर खुले आकाश में चाँदनी के नीचे रखा जाता है।

  3. चरण · ०३

    रात्रि-जागरण और रास-कीर्तन

    मन्दिर परिसर में सम्पूर्ण रात्रि भजन-संध्या होती है। राधा-कृष्ण और श्याम-बाबा की रास-लीला से सम्बन्धित रचनाएँ विशेष रूप से गाई जाती हैं। मध्यरात्रि के समय विशेष आरती होती है।

  4. चरण · ०४

    प्रातः खीर-प्रसाद वितरण

    सूर्योदय के उपरान्त खीर-पात्र मन्दिर ले जाकर बाबा के समक्ष पुनः भोग अर्पित करते हैं। तत्पश्चात् सम्पूर्ण भक्त-समाज में प्रसाद-स्वरूप वितरण होता है। यह खीर अमृततुल्य मानी जाती है।

‖ राधे-कृष्ण · श्याम बाबा ‖

शरद पूर्णिमा की चाँदनी में बाबा की रास-निशा का स्मरण — सम्पूर्ण रात्रि कृष्ण-श्याम की एकता का अनुभव।