निर्जलाएकादशी
‖ १४ जून २०२७ (सोमवार) ‖
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी — वर्ष की सबसे कठिन और सर्वाधिक फलदायी एकादशी, जिसे "भीमसेनी एकादशी" भी कहते हैं। बिना जल ग्रहण किए रखा जाने वाला यह व्रत वर्ष की चौबीसों एकादशियों का पुण्य देता है।
निर्जला एकादशी ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष में आती है, ग्रीष्म की प्रचण्ड तपन में। बिना अन्न और बिना जल के रखा जाने वाला यह व्रत संयम और भक्ति की पराकाष्ठा है — और श्याम-भक्तों के लिए बाबा के चरणों में समर्पण का विशेष अवसर।
- ०१
सबसे कठिन, सबसे फलदायी
शास्त्रों के अनुसार जो भक्त वर्ष की सभी एकादशियाँ नहीं रख सकते, वे केवल यह एक निर्जला एकादशी रखकर सम्पूर्ण वर्ष की एकादशियों का फल प्राप्त कर लेते हैं। इसीलिए इसे एकादशियों में श्रेष्ठ माना गया है।
- ०२
भीमसेनी एकादशी
महाभारत में भीम अधिक भूख के कारण अन्य एकादशियाँ नहीं रख पाते थे; महर्षि व्यास के परामर्श पर उन्होंने वर्ष में केवल यह एक व्रत रखा और सबका पुण्य पाया। इसी से इसका नाम "भीमसेनी एकादशी" पड़ा।
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श्याम बाबा और एकादशी
श्री खाटू श्याम जी श्रीकृष्ण के ही कलियुगी रूप हैं, और एकादशी भगवान विष्णु-कृष्ण की प्रिय तिथि है। निर्जला एकादशी पर बाबा के मन्दिर में विशेष भजन-कीर्तन और जल-सेवा (प्याऊ) की परम्परा है — तपती गर्मी में राहगीरों को जल पिलाना इस दिन का पुण्य-कर्म माना जाता है।
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दशमी की रात्रि से संयम — सात्त्विक भोजन और ब्रह्मचर्य का पालन।
- ०२
एकादशी प्रातः स्नान कर श्रीकृष्ण/श्याम बाबा का स्मरण और संकल्प।
- ०३
दिनभर निर्जल व्रत — सामर्थ्य अनुसार; अस्वस्थ, वृद्ध व रोगी जल या फलाहार ले सकते हैं।
- ०४
जल-दान व अन्न-दान — प्याऊ लगाना, जल से भरे कलश, छाता, पंखा आदि का दान विशेष फलदायी।
- ०५
द्वादशी प्रातः पारण — स्नान, पूजन और जल ग्रहण कर व्रत का समापन।
निर्जला एकादशी — सामान्य प्रश्न
- ०१
निर्जला एकादशी का व्रत कैसे रखा जाता है?
दशमी की रात्रि से संयम आरम्भ कर एकादशी को बिना जल और बिना अन्न के व्रत रखा जाता है, और द्वादशी प्रातः स्नान-पूजन कर जल ग्रहण करते हुए पारण किया जाता है। अस्वस्थ, वृद्ध और रोगी सामर्थ्य अनुसार जल या फलाहार ले सकते हैं।
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निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं?
महाभारत में भीम भूख के कारण अन्य एकादशियाँ नहीं रख पाते थे, इसलिए महर्षि व्यास के परामर्श पर उन्होंने वर्ष में केवल यह एक निर्जला व्रत रखा और सभी एकादशियों का पुण्य पाया — इसी से इसे भीमसेनी एकादशी कहते हैं।
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निर्जला एकादशी पर क्या दान करना चाहिए?
ग्रीष्म ऋतु की इस एकादशी पर जल-दान सर्वश्रेष्ठ है — प्याऊ लगाना, जल-कलश, घड़ा, छाता, पंखा, शरबत और अन्न का दान विशेष फलदायी माना जाता है।
