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खाटू श्यामEN
कथा संग्रह · द्वितीय पर्व

श्रीकृष्ण कीपरीक्षा

पीपल के पत्तों की लीला · शीश का दान · वरदान

कुरुक्षेत्र की ओर बढ़ते बर्बरीक को मार्ग में एक ब्राह्मण मिले — स्वयं श्रीकृष्ण भेष बदलकर। एक संवाद, एक परीक्षा, और एक अनूठा त्याग जिसने महाभारत के बाहर एक नई कथा रच दी।

॥ पर्व · ०२
०१

मार्ग में एक ब्राह्मण

अपनी माता से अनुमति लेकर बर्बरीक तीन बाण और नीले घोड़े पर सवार होकर कुरुक्षेत्र की ओर चले। मार्ग में एक स्थान पर उन्होंने एक तेजस्वी ब्राह्मण को देखा — मुख पर असाधारण कांति, आँखों में गहरी विवेक-दृष्टि।

यह स्वयं श्रीकृष्ण थे। वे जान चुके थे कि बर्बरीक के पास तीन ऐसे बाण हैं जो किसी भी पक्ष की विजय को क्षणमात्र में सुनिश्चित कर सकते हैं। और बर्बरीक का व्रत है — हारे का साथ देना। यदि बर्बरीक युद्ध में उतर गए, तो जैसे ही कोई पक्ष कमजोर हुआ, वे उसी की ओर हो जाते। इस प्रकार युद्ध कभी समाप्त ही नहीं होता।

श्रीकृष्ण के पास सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का दृष्टिकोण था। उन्हें ज्ञात था कि महाभारत का युद्ध धर्म-संस्थापना के लिए आवश्यक है, और इसका निर्णायक अंत होना चाहिए। बर्बरीक के तीन बाण इस निर्णय को बाधित कर सकते थे।

०२

पीपल के पत्तों की परीक्षा

ब्राह्मण-वेशधारी श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से प्रश्न किया — “हे वीर, तुम्हारे तरकश में मात्र तीन बाण हैं। महाभारत के विशाल युद्ध के लिए ये कैसे पर्याप्त होंगे?”

बर्बरीक मुस्कुराए और बोले — “हे विप्र, मेरे तीन बाण ही पर्याप्त हैं। एक ही बाण से मैं समस्त सृष्टि को अंकित कर सकता हूँ।” श्रीकृष्ण ने कहा — “तो प्रमाण दीजिए। यह सम्मुख का पीपल वृक्ष देख रहे हैं? इसके सब पत्तों को एक बाण से पिरो दीजिए।”

बर्बरीक ने अपना पहला बाण निकाला और उच्चारण किया — “यह बाण समस्त वस्तुओं को अंकित करे जिन्हें मैं नष्ट करना चाहता हूँ।” बाण उठा, हवा में चला, और देखते ही देखते पीपल के सब पत्तों को बींधते हुए एक धागे में पिरो गया।

किन्तु बाण फिर भी पूरा शान्त नहीं हुआ — वह बर्बरीक के चरणों के पास हवा में थिरक रहा था। श्रीकृष्ण ने एक पीपल का पत्ता पहले ही चुपके से अपने पैर के नीचे छिपा रखा था। बाण उस छिपे पत्ते को भी ढूँढ रहा था।

श्रीकृष्ण समझ गए — यह बाण सर्वज्ञ है, इसकी दृष्टि से कुछ नहीं छुप सकता। बर्बरीक की क्षमता अपरिमित है।

०३

शीश का दान

श्रीकृष्ण ने बर्बरीक की क्षमता और प्रतिज्ञा दोनों का अर्थ समझ लिया। उन्होंने बर्बरीक से प्रकट होकर कहा — “वत्स, मैं श्रीकृष्ण हूँ। मुझे ज्ञात है तुम्हारी प्रतिज्ञा है हारे का साथ देना। इस युद्ध में दोनों ओर हानि होगी, बारी-बारी से। तुम्हारे बाण इस युद्ध को निर्णय तक पहुँचने नहीं देंगे।”

“धर्म की स्थापना के लिए कुरुक्षेत्र का अंत आवश्यक है। मैं तुमसे एक माँग करना चाहता हूँ — सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय का दान, उसका शीश। क्या तुम अपना शीश दान कर सकोगे?”

बर्बरीक एक क्षण के लिए ठहरे। फिर उनका मुख प्रसन्नता से दीप्त हो उठा। यदि शीश-दान से धर्म की स्थापना होती है, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता है? उन्होंने अपना खड्ग उठाया।

श्रीकृष्ण ने उन्हें रोका — “एक अंतिम इच्छा हो तो माँग लो।” बर्बरीक बोले — “प्रभु, मेरी एक ही इच्छा है — सम्पूर्ण महाभारत युद्ध मैं अपनी आँखों से देख सकूँ।” श्रीकृष्ण ने स्वीकृति दी और एक ऊँचे स्तंभ पर उनके शीश को ऐसे स्थापित किया कि वहाँ से समस्त कुरुक्षेत्र दृष्टिगत हो।

बर्बरीक ने अपने ही हाथों से अपना शीश काटकर दान कर दिया। यह सर्वोच्च त्याग था — महाभारत के सबसे महान योद्धा होते हुए भी, युद्ध से पहले ही, स्वेच्छा से।

०४

कलियुग का वरदान

शीश-दान से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया — “हे वीर, तुम्हारे इस त्याग से मैं अति प्रसन्न हूँ। कलियुग में तुम मेरे ही नाम — श्याम — से पूजे जाओगे। तुम्हारा भक्ति-स्थान खाटू ग्राम होगा। जो भी तुम्हें सच्चे मन से पुकारेगा, उसकी सब मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी।”

“तुम कहलाओगे — हारे का सहारा। जो जीवन में पराजित हो, निराश हो, उसका तुम सच्चा साथ बनोगे। यही तुम्हारा कुलधर्म रहेगा, अब विस्तृत रूप में।”

इस प्रकार बर्बरीक श्रीकृष्ण के अंशावतार बने। उनका शीश युद्ध-समाप्ति तक स्तंभ पर रहा, सब कुछ देखता रहा। पाण्डवों की विजय हुई, धर्म की स्थापना हुई।

युद्ध-पश्चात बर्बरीक का शीश पवित्र भूमि में निहित कर दिया गया। पर यह कथा यहीं समाप्त नहीं होती — कलियुग के आगमन के साथ ही इस शीश ने पुनः प्रकट होकर “खाटू श्याम” के रूप में जग को आलोकित किया। यह तीसरे पर्व की कथा है।

॥ इति द्वितीय पर्व — श्रीकृष्ण की परीक्षा व शीश-दान ॥