मार्ग में एक ब्राह्मण
अपनी माता से अनुमति लेकर बर्बरीक तीन बाण और नीले घोड़े पर सवार होकर कुरुक्षेत्र की ओर चले। मार्ग में एक स्थान पर उन्होंने एक तेजस्वी ब्राह्मण को देखा — मुख पर असाधारण कांति, आँखों में गहरी विवेक-दृष्टि।
यह स्वयं श्रीकृष्ण थे। वे जान चुके थे कि बर्बरीक के पास तीन ऐसे बाण हैं जो किसी भी पक्ष की विजय को क्षणमात्र में सुनिश्चित कर सकते हैं। और बर्बरीक का व्रत है — हारे का साथ देना। यदि बर्बरीक युद्ध में उतर गए, तो जैसे ही कोई पक्ष कमजोर हुआ, वे उसी की ओर हो जाते। इस प्रकार युद्ध कभी समाप्त ही नहीं होता।
श्रीकृष्ण के पास सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का दृष्टिकोण था। उन्हें ज्ञात था कि महाभारत का युद्ध धर्म-संस्थापना के लिए आवश्यक है, और इसका निर्णायक अंत होना चाहिए। बर्बरीक के तीन बाण इस निर्णय को बाधित कर सकते थे।
